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समान कानून कार्यक्षेत्र वाले देशों में देशद्रोह : भारत अमेरिका एवं ब्रिटेन

30 अप्रैल 2021 को, सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 124 ए के तहत देशद्रोह की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका को स्वीकार किया। याचिकाकर्ता- किशोरचंद्र वांगखेमचा और कन्हैया लाल शुक्ला मणिपुर और छत्तीसगढ़ के पत्रकार हैं। इन दोनों पर सोशल मीडिया पर किए गए पोस्ट को लेकर अलग-अलग मौकों पर धारा 124 ए के तहत आरोप लगाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि धारा 124 ए पुराना है, जो भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाने के औपनिवेशिक प्रवृत्तियों को दर्शाती है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 124 ए भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर अनुच्छेद 19 (2) के तहत एक उचित प्रतिबंध है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि 1962 के बाद से बदले हुए सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य के कारण केदारनाथ निर्णय अब लागू नहीं होता है। यह मुख्य रूप से यूनाइटेड किंगडम (यूके) और संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) में राजद्रोह की तुलनात्मक परीक्षा पर भी निर्भर था।

इस पोस्ट में, हम यूके और यूएसए में राजद्रोह के कानूनी इतिहास का पता लगाते हैं और यह भी पड़ताल करते हैं कि क्या देशद्रोह अभिव्यक्ति की आज़ादी का एक अपवाद ,और अपराध है ।



राजद्रोह राजा की आलोचना को रोकने के लिए बनाया गया था

प्रिंटिंग प्रेस की स्वतंत्रता और राजा की आलोचना करने की क्षमता को दबाने के लिए 13 वीं शताब्दी में ब्रिटेन में राजद्रोह को एक हथियार के रूप में तैयार किया गया था। राजद्रोह अधिनियम, 1661 ने राजा के खिलाफ कोई भी शब्द लिखने, छापने या प्रचार करने वाले को सजा दी। यह सरकारी अधिकारियों और न्यायाधीशों की प्रतिष्ठा या कार्यों के खिलाफ बदनामी और मुकदमों के रूप में विकसित हुआ। इसका मकसद सरकार में आम व्यक्ति के विश्वास की रक्षा करना और समाज में 'शांति खत्म होने से बचना था।

18 वीं शताब्दी तक, ब्रिटेन में कानून की बहुत आलोचना हुई थी, हालांकि, ब्रिटेन में भाषण और अभिव्यक्ति को नियंत्रित करने में इसके प्रभाव को दर्ज किया गया और फिर भारत पर लागू किया गया। महारानी बनाम जोगेंद्र चंद्र बोस भारत में राजद्रोह का पहला दर्ज मामला था। जनता को सरकार का विरोध करने या उसके अधिकार को न मानने के लिए प्रोत्साहित करना देशद्रोह माना जाता था।

1977 में, ब्रिटेन के विधि आयोग द्वारा अधिनियम को समाप्त करने का सुझाव देते हुए एक कार्य पत्र प्रकाशित किया गया था। इसने सुझाव दिया कि कई कानून मौजूद थे जो देशद्रोह के तहत मुद्दों को कवर करते थे और नीति के बजाय 'राजनीति' पर आधारित कानून गैर जरुरी था। बत्तीस साल बाद, कोरोनर्स एंड जस्टिस एक्ट, 2009 की धारा 73 ने राजद्रोह के अपराध को समाप्त कर दिया।

अमेरिका ने संघीय सरकार की रक्षा के लिए देशद्रोह पेश किया

1798 में, जॉन एडम्स की अध्यक्षता में, संघीय सरकार के खिलाफ झूठे बयान देने के अपराधीकरण के लिए राजद्रोह अधिनियम पारित किया गया था। इसे 1801 में समाप्त होने के लिए बनाया गया था क्योंकि इन कानूनों को बनाने के पीछे का कारण अर्ध-युद्ध के दौरान सरकार की सुरक्षा थी।

राजद्रोह का उल्लेख और अपराधीकरण अगली बार प्रथम विश्व युद्ध के दौरान देखा गया था। अमेरिकी युद्ध के प्रयासों में हस्तक्षेप करने वाले झूठे बयान देने वाले को दंडित करने के लिए द सेडिशन एक्ट, 1918 की धारा 3 का मसौदा तैयार किया गया था। इसमें अमेरिकी सरकार, ध्वज, संविधान या सेना का अपमान करना शामिल था। इस संबंध में सबसे प्रमुख मामला इन रे डेब्स का है, जहां एक समाजवादी कार्यकर्ता यूजीन डेब्स को युद्ध विरोधी भाषण के लिए 10 साल जेल की सजा सुनाई गई थी। न्यायमूर्ति ओलिवर वेंडेल होम्स ने कहा कि कुछ परिस्थितियों में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कम किया जा सकता है। 1921 में इस अधिनियम को निरस्त कर दिया गया था। सुलिवन बनाम न्यूयॉर्क टाइम्स के मामले ने पहले संशोधन के तहत बोलने की स्वतंत्रता को बरकरार रखा, जिसने मानहानि के उपचार को प्रभावित किया। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जब तक कोई बयान दुर्भावना या सच्चाई के प्रति के लिए नहीं दिया गया हो तब तक पहला संशोधन सार्वजनिक अधिकारियों की आलोचना की रक्षा करता है।

क्या भारत को अब भी देशद्रोह की जरूरत है?

अमेरिका और ब्रिटेन दोनों में, देशद्रोह को खत्म करने के पीछे का प्रमुख तर्क अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण रहा है। सरकार के राजनीतिक एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए राजद्रोह का संभावित दुरुपयोग भी राजद्रोह को खत्म करने का एक कारण बन गया। यूजीन डेब्स और शेन्क बनाम संयुक्त राज्य अमेरिका के मामले भी इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि राजद्रोह के आरोप राजनीति से प्रेरित था। प्रथम विश्व युद्ध के समय डेब्स और शेन्क दोनों समाजवादी कार्यकर्ता थे।

धारा 124 ए के खिलाफ वर्तमान याचिका प्रावधान के कथित दुरुपयोग के उदाहरणों को भी उजागर करती है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि 1962 में जब केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य में प्रावधान को बरकरार रखा गया तब की उत्पन्न नागरिक अशांति की परिस्थितियां अब भारत पर लागू नहीं होती है। दायर किए गए आरोपों का एक बड़ा हिस्सा राजनीतिक दुरुपयोग के उदाहरण भी पेश करती है।

2021 में पूरे भारत में ऐसे कई दावे हुए हैं। TV5( टीवी फाइव ) न्यूज चैनल ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर मीडिया हाउस के खिलाफ धारा.124 ए के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की है। फरवरी 2021 में, किसानों के विरोध के बारे में सोशल मीडिया पर एक अलग विरोध के पुराने वीडियो को पोस्ट करने के लिए दो प्रदर्शनकारियों पर देशद्रोह का आरोप लगाया गया। पटियाला हाउस के जिला अदालत ने माना कि प्रदर्शनकारियों को चुप कराने के लिए देशद्रोह का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है

किसानों के विरोध के संबंध में, देशद्रोह के आरोप में जलवायु कार्यकर्ता दिशा रवि की गिरफ्तारी ने भी देशद्रोह कानूनों के दुरुपयोग पर सवाल उठाए। अदालत ने उसे जमानत दे दी, और अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने सरकार से असहमति के लिए व्यक्तियों को जेल में डालने की निंदा की।

यदि 'देशद्रोह' अभी भी प्रासंगिक है और भारत में इसकी आवश्यकता है, तो इसे निपटाने में वर्तमान संवैधानिक चुनौती महत्वपूर्ण होगी। और क्या यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए क़ानूनी रूप से वैध संवैधानिक अपवाद है?


This piece is from the Supreme Court Observer translated by Priya Jain and Rajesh Ranjan of Constitution Connect.

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