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Desk Brief: भारतीय संविधान में मैचमैकिंग (कुंडली मिलान)

हाल ही में आये दो टीवी शो - सूटेबल बॉय और इंडियन मैचमैकिंग ने एक बार फिर से इस बात को साफ किया है जो कई लोगो को पहले से पता भी था की - धर्म, वर्ग और जाति हमेशा से भारत में जीवनसाथी की पसंद को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण विचार रहे हैं । जबकि दोनों शो को व्यापक रूप से देखा गया , अ सूटेबल बॉय कुछ विवाद में घिर गया : मध्यप्रदेश में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के नियत से मंदिर में दो धार्मिक मतों में विश्वास रखने वाले जोड़े के चुम्बन दृश्य को दिखाने को लेकर नेटफ्लिक्स इंडिया के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गयी।

यह रिपोर्ट जिसमे यह दावा किया गया की यह दृश्य " लव जिहाद " को बढ़ावा देता है पड़ोसी राज्य उत्तरप्रदेश में आये " गैरकानूनी धार्मिक परिवर्तन अध्यादेश " जिसे आम तौर पर ' लव जिहाद ' कानून भी कहा जाता है उस लिहाज से विशेष महत्त्व रखता है । यह अध्यादेश केवल विवाह के लिए किए गए किसी भी धार्मिक परिवर्तन को अमान्य करता है। जबकि कई अन्य राज्यों में पहले से ही धार्मिक रूपांतरण को रोकने वाले कानून हैं, यूपी पहला ऐसा राज्य है जिसमें हिंदू महिलाओं को मुस्लिम पुरुषों से शादी करने से रोकने के इरादे से ऐसा स्पष्ट कानून बनाया गया है ।

अंतरधार्मिक विवाह का विरोध, अंतर्जातीय विवाह के विरोध के बराबर है, जिसमें दोनों ऐतिहासिक पूर्वाग्रहों और विशिष्ट समुदायों के बीच तनाव की पृष्ठभूमि में विकसित हुए हैं। मौलिक अधिकारों पर उप-समिति के कुछ सदस्य - जैसे राजकुमारी अमृत कौर और हंसा जीवराज मेहता - ने अंतरजातीय विवाह को मौलिक अधिकार के रूप में शामिल करने की वकालत की।

ये सदस्य संवैधानिक प्रावधान पेश करना चाहते थे जो राज्य को अंतर्राज्यीय विवाहों में किसी भी बाधा या मुश्किल को दूर करने के लिए बाध्य करता। शायद अंतरजातीय विवाह के खिलाफ सामाजिक और संस्थागत कलंक को कम करने के प्रयास में यह प्रावधान कारगर होता। हालांकि, वे अपने प्रयासों में असफल रहे।

कौर और मेहता के प्रस्ताव डॉ बी आर अंबेडकर, संविधान - सभा के मसौदा समिति के अध्यक्ष, और जाति-विरोधी आंदोलन में एक प्रमुख व्यक्ति , के विचार को भी प्रदर्शित किया। अम्बेडकर का यह भी मानना ​​था कि विभिन्न समुदायों के सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व ( एक- साथ सदभाव से रहने के लिए) के लिए अंतर विवाह महत्वपूर्ण था। एनहिलेशन ऑफ़ कास्ट ( जाति का उन्मूलन 1936 ) नामक किताब में, उन्होंने एक भावना व्यक्त की जो जाति और धार्मिक तनावों पर समान रूप से लागू होती है:

.."वास्तविक उपचार [छुआछूत के खिलाफ] अंतर-विवाह है। रक्त का मिश्रण ( मेल )अकेले ही परिजनों और परिजनों के होने का अहसास पैदा कर सकता है, और जब तक यह रिश्तेदारी की भावना, दयालु होने की, सर्वोपरि नहीं हो जाती है, तब अलगाववादी भावना - जाति द्वारा बनाई गई बाहरी की भावना गायब नहीं होगी - जहां समाज पहले से ही ठीक है अन्य संबंधों के अनुसार, विवाह जीवन की एक साधारण घटना है। लेकिन जहां समाज को कटा हुआ माना जाता है, एक जोड़ने वाली ताकत के रूप में शादी एक जरुरी आवश्यकता बन जाती है। ”

अंतर-धार्मिक विवाहों को नियंत्रित करने वाले वर्तमान राष्ट्रीय कानूनी ढांचे - विशेष विवाह अधिनियम, 1954 - में व्यक्तिगत कानूनों के तहत निर्धारित सरल प्रक्रियाओं के विपरीत, अपनी शादी को पंजीकृत करने के लिए शादी कर रहे जोड़े को कई प्रक्रियात्मक दायित्वों को पूरा करना पड़ता है । भारत के विधि आयोग ने 2012 में इस अधिनियम के तहत प्रक्रियाओं को सरल और तेज करने की सिफारिश की थी, लेकिन संसद ने चर्चा के लिए मामला ही नहीं उठाया।

अंतर -धार्मिक विवाह के खिलाफ लगातार बढ़ते सांप्रदायिक भावना और सामाजिक कलंक को देखते हुए, राज्य को इस तरह के विवाहों के खिलाफ संस्थागत बाधाओं को बढ़ाने के बजाय कम करना चाहिए। क्या यह कौर और मेहता के प्रस्ताव पर फिर से विचार करने का समय है?

This article is published in collaboration with Centre for Law & Policy Research. Translated by Rajesh Ranjan. Read this in English here.

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