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Desk Brief: क्यों हमारे संविधान निर्माताओं ने देशद्रोह कानून का विरोध किया ?

1948 के भारत के मसौदे( ड्राफ्ट) संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार शामिल था। हालांकि, यह अधिकार पूर्ण नहीं था, इस अधिकार पर कई सीमाएँ लगाई गई थी। उनमें से एक देशद्रोह था: देशद्रोह से संबंधित मौजूदा या भविष्य के कानून, क़ानूनी तौर पर वैध और सम्मत होंगे भले ही वे भाषण और अभिव्यक्ति के अधिकार को सीमित करते हों।


1 दिसंबर 1948 को के.एम. मुंशी ने संविधान सभा में एक संशोधन पेश किया जिसमें भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर देशद्रोह ’के प्रतिबंध को हटाने का प्रस्ताव था। मुंशी ने भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए को लागू किया जिसने देशद्रोह का अपराधीकरण किया। इस कानून ने आधी सदी से भी अधिक समय तक भारतीयों पर बड़ा प्रभाव डाला था। ब्रिटिश अधिकारियों ने औपनिवेशिक सरकार के उद्देश्य से अलग, असंतोष और आलोचना के सहज भावों के अभिव्यक्ति लिए, भारतीयों को दंडित करने के लिए इस कानून का मनमाने ढंग से उपयोग किया था।






ज्यादातर संविधान -सभा सदस्य मुंशी के संशोधन का समर्थन करते दिखाई देते हैं। कई लोगों के लिए, राजद्रोह ने गहरी व्यक्तिगत और राजनीतिक नाराजगी पैदा की थी। उन्होंने कानून के तहत आरोप लगाए जाने और जेल भेज दिए जाने के अपने अनुभवों को साझा किया । भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं को गिरफ्तार करने के लिए देशद्रोह के कानून का व्यापक रूप से उपयोग किया गया। गांधी पर खुद देशद्रोह का आरोप लगाया गया था। अपने राजद्रोह - मुकदमे के ट्रायल के दौरान, गांधी ने भारतीय दंड संहिता की राजनीतिक धाराओं के बीच धारा 124-ए को भारतीय दंड विधान के राजकुमार के रूप में उसकी संज्ञा दिया, जो नागरिक स्वतंत्रता को दबाने के लिए बनाया गया था।


यह देखते हुए कि भारत एक लोकतांत्रिक देश बनने जा रहा था, मुंशी ने तर्क दिया:

सरकार की स्वागत- योग्य आलोचना और उकसावे जिससे सुरक्षा व्यवस्था कमजोर हो सकती है ,जिस पर सभ्य जीवन आधारित है, या जिसकी गणना राज्य को उखाड़ फेंकने के लिए की जाती है, उसमे अंतर होनी चाहिए । इसलिए” देशद्रोह ’शब्द को छोड़ दिया गया है।


मुंशी ने आगे कहा: 'सरकार की आलोचना' लोकतंत्र का सार था ' वह 1942 के भारतीय फेडरल कोर्ट के फैसले से सहमत दिखाई दिए, जिसमें कहा गया था कि देशद्रोह को सरकारों के घूरने के लिए 'अपराध नहीं बनाया गया था ...'। यह दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में जो कहा उसके समान ही है ... सरकार के आलोचकों को फंसाने के लिए देशद्रोह का आरोप नहीं लगाया जा सकता है '। अदालत 22 वर्षीय जलवायु परिवर्तन कार्यकर्ता दिशा रवि की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो देशद्रोह कानून के तहत हालिया आरोपित हुई हैं।

अधिकांश संविधान सभा सदस्यों ने मुंशी के साथ सहमति व्यक्त की और उनके संशोधन का समर्थन किया। बहस के अंत में, संविधान सभा ने स्वतंत्र भाषण और अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध के रूप में देशद्रोह को हटा दिया।

अपने भाषण में, मुंशी ने कहा था कि अगर भारतीय संविधान से देशद्रोह को नहीं हटाया गया, तो एक गलत धारणा बनाई जाएगी कि हम भारतीय दंड विधान की धारा 124-A को , या उसके अर्थ को, बनाए रखना चाहते हैं जिसे पहले के दिनों में अच्छा कानून माना जाता था।


विडंबना यह है कि भारत के संविधान 1950 में देशद्रोह का कोई उल्लेख नहीं किया गया था, लेकिन भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए भारतीय क़ानूनी पुस्तकों पर बनी रही। धारा 124-ए को निरस्त करने के लिए लगातार सरकारों और विधायिका के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं प्रतीत होता है। बल्कि इससे इतर राज्य के अधिकारियों ने असंतोष और आलोचना को दबाने के लिए इस कानून का प्रचंड तरीके से उपयोग किया गया। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की हालिया रिपोर्ट से यह पता चलता है कि देश में राजद्रोह से संबंधित मामलों की संख्या बढ़ी है।


कई देशों में किसी न किसी रूप में देशद्रोह के कानून मौजूद हैं। हालांकि, पिछले कुछ दशकों में, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक लोकतंत्र के साथ राजद्रोह कानून की विसंगति को वैश्विक मान्यता रही है। कई देशों ने मौजूदा राजद्रोह कानूनों को या तो रद्द कर दिया है या उनके दायरे को काफी कम कर दिया है: न्यूजीलैंड ने 2007 में अपने राजद्रोह कानून, 2009 में यूनाइटेड किंगडम और 2010 में ऑस्ट्रेलिया ने इससे छुटकारा पा लिया।

क्या भारत को को भी इन देशों की श्रेणी में शामिल हो जाना चाहिए ?


This article is published in collaboration with Centre for Law & Policy Research. Translated by Rajesh Ranjan. Read this in English here.

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