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मराठों की आरक्षण की मांग: मुकदमे का इतिहास ( 2014 - 21)

मराठों ने 1982 में भी आरक्षण की मांग के लिए संगठित किया था, जब अन्नासाहेब पाटिल ने विरोध में अपनी जान ले ली थी। हालाँकि, वे आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण के लिए थे। मंडल आयोग के बाद जाति के आधार पर मराठा आरक्षण की मांग शुरू हुई। 1997 में, मराठा संघ और मराठा सेवा संघ ने मांग के लिए पहले बड़े पैमाने पर प्रदर्शनों में से एक का आयोजन किया था। 2009 तक पूर्व मुख्यमंत्रियों शरद पवार और विलासराव देशमुख ने भी समर्थन दिया था।

शैक्षिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों (ईएसबीसी) अधिनियम अध्यादेश, अधिनियम 2014: बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा रोक दिया गया

2013 में, सीएम पृथ्वीराज चव्हाण ने कैबिनेट मंत्री नारायण राणे की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। उन्होंने एक सर्वेक्षण किया और निष्कर्ष निकाला कि मराठा एक पिछड़ा वर्ग थे। जबकि पहले के राष्ट्रीय और राज्य सर्वेक्षणों के निष्कर्ष विपरीतथे। 9 जुलाई 2014 को, राज्यपाल को महाराष्ट्र राज्य आरक्षण ,शैक्षिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा वर्ग (ईएसबीसी) अध्यादेश, 2014 पारित करने की सलाह दी गई थी।

इसने सार्वजनिक रोजगार और उच्च शिक्षा में मराठों के लिए 16% आरक्षण प्रदान किया। डॉ. महमूद-उर-रहमान समिति की 2013 की एक रिपोर्ट के आधार पर कुछ मुस्लिम समुदायों के लिए भी 5% आरक्षित किया गया था। अध्यादेश को तुरंत बॉम्बे उच्च न्यायालयमें चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इंद्रा साहनी बनाम भारत सरकार में निर्धारित आरक्षण जो 50% की सीमा है उससे अधिक है। और यह पिछड़ेपन का संकेत देते हुए मात्रात्मक डेटा प्रदान करने में विफल रहा। 14 नवंबर 2014 को अपने अंतरिम आदेश में, कोर्ट ने पूरी दलीलें सुने जाने तक , आंशिक रूप से अध्यादेश पर रोक लगा दी, । महाराष्ट्र में पहले से ही 52% आरक्षण था।

इन कार्यवाही के दौरान, राज्य विधानसभा चुनावों की वजह से सरकार बदल गया था। अब सीएम देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली नई सरकार ने तुरंत कार्रवाई की। 9 जनवरी 2015 को अध्यादेश को एक कानून के रूप में पारित किया गया था। हालांकि, मुस्लिम समुदायों के लिए जो प्रावधान थे उसे हटा दिया गया था। अप्रैल 2016 में, बॉम्बे उच्च न्यायालयने कानून का अध्यादेश से समानता की वजह से कानून पर रोक लगा दिया ।

सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) अधिनियम बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा सही ठहराया गया

सरकार ने तब इस मुद्दे को देखने के लिए एक क़ानूनी आयोग का गठन किया था। इसी नाम के एक 2005 के एक कानून के तहत गठित महाराष्ट्र राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग (MSBCC) को एक सर्वेक्षण करने के लिए कहा गया था। इसका नेतृत्व बॉम्बे उच्च न्यायालय के रिटायर्ड न्यायाधीश एनजी गायकवाड़ ने किया। इसने 15 नवंबर, 2018 को एक रिपोर्ट प्रस्तुत की। रिपोर्ट में उच्च शिक्षा में 12% और सार्वजनिक रोजगार में 13% आरक्षण की सिफारिश की गई। तुरंत एक बार फिर 30 नवंबर को महाराष्ट्र राज्य सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा वर्ग आरक्षण (एसईबीसी) अधिनियम, 2018 को कानून बना दिया गया। हालाँकि, इसने कुल मिलाकर 16% आरक्षण प्रदान किया।

इस बीच, 11 अगस्त 2018 को, संसद ने 102वां संवैधानिक (संशोधन) अधिनियम, 2018 पारित किया था। इस अधिनियम ने पिछड़ा वर्ग के लिए राष्ट्रीय आयोग को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया। हालाँकि, ऐसा करते हुए, इसने अनुच्छेद 324A भी पेश किया। इस अनुच्छेद ने राष्ट्रपति के लिए सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा वर्ग की 'केंद्रीय सूची' को अधिसूचित करने का प्रावधान बनाया। जब एसईबीसी अधिनियम, 2018 को बॉम्बे उच्च न्यायालयमें चुनौती दी गई, तो एक नया तर्क पेश किया गया। याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि नए अनुच्छेद 342ए ने एसईबीसी की पहचान करने के लिए राज्यों की शक्तियों को छीन लिया। और इसलिए, वे आरक्षण के लिए मराठों जैसे नए समुदायों की पहचान नहीं कर सके।

अदालत ने लगभग 40 दिनों तक मामले की सुनवाई की और 27 जून 2019 को कानून को बरकरार रखा। इसने माना कि गायकवाड़ आयोग की रिपोर्ट में आरक्षण पर 50% की सीमा के अपवाद के रूप में 'असाधारण परिस्थितियों' को सही ठहराने के लिए पर्याप्त डेटा था। यह भी माना गया कि 102वें संशोधन ने सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा वर्ग की पहचान करने के लिए राज्यों की शक्तियों को नहीं प्रभावित किया। हालांकि, कोर्ट ने गायकवाड़ आयोग की सिफारिश के अनुसार आरक्षण के प्रतिशत को 16% से घटाकर 12% और 13% कर दिया। महाराष्ट्र सरकार ने इसी के अनुसार कानून में संशोधन कर दिया।

सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ा वर्ग संशोधित अधिनियम 2018,: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वीकार की गई अपील

फैसले की अपील की गई थी। 12 जुलाई 2019 को नोटिस जारी किया गया एवं मामले को स्वीकार करने दलीलें सुनी गईं। चूंकि मामला सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष आया था, इसलिए महाराष्ट्र राज्य ने एक नया तर्क पेश किया। उन्होंने यह तर्क देने की कोशिश की कि 50% की सीमा पर ही फिर से विचार किया जाना चाहिए। यह नियम सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय में निर्धारित किया गया था इसलिए वही न्यायालय इस पर पुनर्विचार कर सकता था की क्या कोई बाध्यकारी कारण थे?

जस्टिस नागेश्वर राव, हेमंत गुप्ता और रवींद्र भट्ट की पीठ ने शुरुआती दलीलें सुनीं। 9 सितंबर 2020 को अपने आदेश में, 50% की सीमा और नए अनुच्छेद 342 ए की व्याख्या के संबंध में कानून के महत्वपूर्ण सवालों पर निर्णय लेने के लिए , उन्होंने मामले को एक बड़ी पीठ के पास भेजने का फैसला किया। उन्होंने मामले की सुनवाई होने तक कानून के लागू होने पर भी रोक लगा दी। 2019 में, महाराष्ट्र सरकार एक बार फिर बदल गई थी, जिसका नेतृत्व अब सीएम उद्धव ठाकरे कर रहे हैं। लेकिन उनके विचार नहीं बदलें।

सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ा वर्ग अधिनियम को रद्द कर दिया

ऊपर के तीन न्यायाधीशों और न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति अब्दुल नज़ीर के साथ एक संविधान पीठ का गठन किया गया था। चूंकि कानूनी मुद्दे सभी राज्यों को प्रभावित करेंगे, इसलिए उन सभी को नोटिस जारी किया गया और अपने विचार प्रस्तुत किये गए। महामारी के दौरान ऑनलाइन माध्यम से दस दिनों की सुनवाई के बाद, बेंच ने 5 मई को फैसला सुनाया। इसने 50% नियम को बरकरार रखा। यह देखते हुए कि मराठा राजनीतिक रूप से प्रभावशाली थे, यह माना गया कि सीमा का उल्लंघन करने के लिए कोई उचित अपवाद नहीं था।

इसके अलावा, 3:2 के मत से यह माना गया कि 102वें संशोधन ने एसईबीसी की पहचान करने के लिए राज्यों की शक्तियों को छीन लिया।

फैसले के बाद, सीएम ठाकरे ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से मराठा आरक्षण प्रदान करने का अनुरोध किया। केंद्र सरकार पहले ही पुनर्विचार याचिका दाखिल कर चुकी है। उन्होंने 102वें संशोधन की न्यायालय की व्याख्या पर फिर से विचार करने की मांग की है। इस फैसले ने अब मराठा आरक्षण देने में एक नहीं, बल्कि दो कानूनी अड़चनें छोड़ दी हैं।


This piece is from the Supreme Court Observer translated by Priya Jain and Rajesh Ranjan of Constitution Connect.

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