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आपराधिक आरोप तय हो जाने पर चुनावी अयोग्यता

पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन बनाम भारत संघ

निर्णय का सामान्य सारांश

25 सितंबर 2018 को न्यायालय ने चुनावी अयोग्यता मामले में अपना फैसला सुनाया। पांच न्यायाधीशों की खण्डपीठ ने सर्वसम्मति से फैसला किया कि वह उन उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से अयोग्य नहीं ठहरा सकती, जिनके खिलाफ आपराधिक आरोप तय किए गए हैं। न्यायालय ने सुझाव दिया कि राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण को रोकने के लिए संसद कानून बनाए। इसके अलावा, अदालत ने राजनीति में अपराधीकरण का मुकाबला करने के उद्देश्य से निर्देश भी जारी किए।

याचिकाकर्ताओं की क्या मांगा थी-

याचिकाकर्ता, एक गैर सरकारी संगठन, जिसे पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन के नाम से जाना जाता है, ने निम्नलिखित अनुरोध किया था:

  1. जिन व्यक्तियों के खिलाफ आपराधिक आरोप तय कर किए गए हैं, उन्हें संसद और राज्य विधानसभाओं की सदस्यता से अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिए। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 (आर.पी. ​​एक्ट) की धारा 8 के अंतर्गत आरोप तय हो जाने पर अयोग्यता शामिल होनी चाहिए।

  2. अपने आपराधिक इतिहास (लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33ए देखें) के बारे में झूठे हलफनामे दाखिल करने वाले चुनावी उम्मीदवारों को “स्वतः” संसद और राज्य विधानसभाओं की सदस्यता से अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिए।

शक्तियों के विभाजन का सम्मान

खण्डपीठ ने सर्वसम्मति से फैसला सुनाया कि वह लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (आरपी एक्ट) में बदलाव नहीं कर सकती। इस खण्डपीठ ने माना कि शक्तियों के विभाजन ने न्यायालय को कानून बनाने में संलग्न होने से रोका है। न्यायालय ने माना कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (आरपी एक्ट) की धारा 8 में बदलाव कानून बनाने के बराबर होगा, जो कि विधायिका की विशेष शक्ति है।

न्यायालय ने माना कि वह अयोग्यता से जुड़े कानूनों में बदलाव नहीं कर सकती क्योंकि यह मामला भी विधायिका के अंतर्गत ही आता है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (आर.पी. एक्ट) की धारा 8 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अयोग्यता केवल दोष सिद्ध होने पर ही शुरू होती है और इसमें न्यायिक हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है।

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (आर.पी. एक्ट) की धारा 8, जो किसी संसद और राज्य विधानमंडल के सदस्य की सदस्यता के अयोग्यता से संबंधित है, की संवैधानिक वैधता के बारे में कोई सवाल ही नहीं उठता है। संविधान के अनुच्छेद 102(1)(e) और 191(1)(e) स्पष्ट रूप से संसद को विधायी निकायों के सदस्यों की अयोग्यता के मानदंड को तय करने वाले कानून बनाने की शक्ति प्रदान करते हैं। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (आर.पी. एक्ट) संसद द्वारा पारित किया गया था।

खण्डपीठ ने शक्ति विभाजन के सिद्धांत का सम्मान करते हुए चुनाव आयोग को किसी पार्टी के प्रतीक को हटाने की शक्ति की नहीं देने का फैसला किया। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि चुनाव आयोग को किसी पार्टी के चुनाव चिन्ह को रद्द करने का अधिकार दिया जाना चाहिए, अगर वह पार्टी आपराधिक उम्मीदवारों को खड़ा करता है। यहाँ तक कि न्यायालय ने राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण की पहचान की, इसके बावजूद उसने कहा कि उसे अपने-आप को न्यायपालिका की भूमिका तक सीमित रखना चाहिए। जैसा कि महान्यायवादी (Attorney General) केके वेणुगोपाल ने सुनवाई के दौरान तर्क दिया, अदालत को ऐसा प्रयास नहीं करना चाहिए जो प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से विधायिका के अधिकार क्षेत्र को प्रभावित करे।

अदालत ने याचिकाकर्ता के दूसरे अनुरोध पर विचार नहीं किया, जिसमें धारा 125ए को धारा 8 के दायरे में लाने की बात की गई थी। याचिकाकर्ता ने झूठे हलफनामे दाखिल करने वाले उम्मीदवारों को “स्वतः” अयोग्य घोषित करने की मांग की थी। न्यायालय ने शक्ति के विभाजन का हवाला देते हुए इस याचिका पर विचार नहीं किया।

स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव और जानने का मौलिक अधिकार

खण्डपीठ ने माना कि राजनीतिक दलों द्वारा आपराधिक पृष्ठभूमि से आने वाले उम्मीदवारों को मैदान में उतारने की अनुमति देने से भारतीय लोकतंत्र को अस्थिर करने वाला खतरा है। इसके अलावा, खण्डपीठ ने माना कि नागरिकों को यह जानने का मौलिक अधिकार है कि किसी चुनावी उम्मीदवार का आपराधिक इतिहास है या नहीं। खण्डपीठ ने इस बात पर जोर दिया कि स्वस्थ लोकतंत्र के लिए एक जागरूक मतदाता जरूरी है।

न्यायालय ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, पी.यू.सी.एल. और रिसर्जेंस इंडिया का हवाला देते हुए यह बात रखी कि "जानने का मौलिक अधिकार" संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार से आता है।

खण्डपीठ ने संसद से ऐसा कानून बनाने को कहा जो गंभीर अपराधों के आरोपी उम्मीदवारों को राजनीति में आने से रोक सके। खण्डपीठ ने सुझाव दिया कि इस तरह के कानून इस लिए आवश्यक हैं कि जागरूक मतदाता यह सुनिश्चित कर सकें कि वे किसे चुनना चाहते हैं। खण्डपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि मतदाता द्वारा जागरूक विकल्प चुनना एक 'मजबूत और शुद्ध' लोकतंत्र की आधारशिला है।

खण्डपीठ ने अगला कदम निर्देश जारी करने का उठाया। खण्डपीठ को उम्मीद है कि ये निर्देश नागरिकों के मौलिक अधिकार को यह जानने में कि उम्मीदवारों का आपराधिक इतिहास है या नहीं और अधिक प्रभावी करेंगे। उसे उम्मीद है कि संसद भविष्य के कानून का मसौदा तैयार करने में इन निर्देशों से प्रेरणा लेगी। इसने निम्नलिखित निर्देश जारी किए(¶116):

  1. प्रत्येक चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार चुनाव आयोग द्वारा प्रदान किए गए फॉर्म को भरेगा और फॉर्म में आवश्यक सभी विवरण होने चाहिए

  2. यह स्पष्ट शब्दों में उम्मीदवार के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों के बारे में बताएगी।

  3. यदि कोई उम्मीदवार किसी विशेष पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहा है, तो उसे अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों के बारे में पार्टी को सूचित करना आवश्यक है।

  4. संबंधित राजनीतिक दल आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों से संबंधित समस्त जानकारी अपनी वेबसाइट पर डालने के लिए बाध्य होंगे।

  5. उम्मीदवार के साथ-साथ संबंधित राजनीतिक दल उम्मीदवार के पूर्ववृत्त (पूर्व के आपराधिक मामलों) के बारे में क्षेत्र में व्यापक पहुँच रखने वाले समाचार पत्रों में एक घोषणा जारी करेगा और इसके बारे में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में व्यापक प्रचार भी करेगा। जब हम व्यापक प्रचार की बात करते हैं, तो हमारा तात्पर्य यह है कि नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद कम से कम तीन बार ऐसा किया जाना चाहिए।

ध्यान दें कि, न्यायालय इन निर्देशों के कार्यान्वयन की सक्रिय रूप से निगरानी नहीं करेगा। अदालत ने निर्देशों को लागू करने के लिए 'संबंधित अधिकारियों' को आदेशित किया है।

This piece is translated by Kundan Kumar Chaudhary from Constitution Connect.

Read in English here.

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