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आधार की समीक्षा

Beghar Foundation v. Justice K.S. Puttaswamy (Ret'd)


बेघर फाउंडेशन बनाम जस्टिस के.एस. पुट्टस्वामी (सेवानिवृत्त)


26 सितंबर 2018 को, पाँच-न्यायाधीशों की पीठ ने 4:1 के फैसले से आधार अधिनियम की संवैधानिकता को बरकरार रखा। कुछ प्रावधानों का सीमित व्याख्या किया गया। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने असहमति जताई। उन्होंने तर्क दिया कि पूरा अधिनियम संवैधानिक वैधता की कसौटी (के पैमाने) पर खरा नहीं उतरा।


भारतीय संविधान (1950) के अनुच्छेद 137 के तहत सात पक्षों ने समीक्षा याचिका दायर की। उन्होंने तर्क दिया कि निर्णय गलत है और महत्वपूर्ण बिंदुओं एवं सबूतों पर विचार करने में विफल रहा है। पाँच न्यायधीशों की नई पीठ ने (जिसमें जस्टिस ए.एम. खानविलकर, डी.वाई. चंद्रचूड़, अशोक भूषण, एस अब्दुल नज़ीर और बी.आर. गवई थे) 11 जनवरी 2021 को चैंबर्स में मामले की सुनवाई की।


20 जनवरी 2021 को संविधान पीठ ने 4:1 के फैसले से पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। बहुमत का राय मामले के (गुणदोष के) पक्ष में नहीं आया: इसके बजाय, यह कहा गया कि 'कानून में बदलाव अथवा बाद के समन्वय / बड़ी पीठ के निर्णय' अपने आप में समीक्षा के लिए आधार नहीं होंगे। बहुमत की राय रोजर मैथ्यू बनाम साउथ इंडियन बैंक का सन्दर्भ दे रही थी जिसने 2018 के आधार फैसले के बारे में चिंता जताई थी।


न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अपनी असहमति में तर्क दिया कि वर्तमान स्थिति में समीक्षा याचिका को खारिज नहीं किया जाना चाहिए।

2018 के आधार फैसले में दो महत्वपूर्ण सवालों का जवाब देना था। पहला यह कि क्या किसी विधेयक को 'धन विधेयक' के रूप में वर्गीकृत करने का लोक सभा के अध्यक्ष का निर्णय अंतिम है या इसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। दूसरा क्या आधार अधिनियम को वैध रूप से 'धन विधेयक' के रूप में प्रमाणित किया गया था।

पहले प्रश्न पर बहुमत की राय यह थी कि कुछ परिस्थितियों में जिसमें संविधान का उल्लंघन शामिल हो सकता है, धन विधेयक की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। आधार अधिनियम पर, बहुमत ने निष्कर्ष निकाला कि इसमें धन विधेयक के 'तत्व' थे और इस तरह प्रमाणीकरण मान्य था।

इसके बाद, रोजर मैथ्यू केस में धन विधेयक की न्यायिक समीक्षा के दायरे के संबंध में एक समान प्रश्न उठा। इस केस ने वित्त अधिनियम, 2017 को चुनौती दी और पूछा कि क्या इसे धन विधेयक के रूप में सही ढंग से प्रमाणित किया गया था। तत्कालीन सी.जे.आई रंजन गोगोई की अगुवाई वाली पाँच-न्यायाधीशों की पीठ का मानना ​​​​था कि 2018 के आधार फैसले में धन विधेयक की न्यायिक समीक्षा के दायरे पर 'पर्याप्त चर्चा' नहीं हुई थी। और इसने 'उदारतापूर्वक', बिना किसी 'विश्वसनीय तर्क' के आधार पर “आधार अधिनियम” को धन विधेयक के रूप में व्याख्यायित किया। इसलिए कोर्ट रोजर मैथ्यू में फैसले को बाध्यकारी मिसाल के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सका। इसके बजाय, इसने धन विधेयक की न्यायिक समीक्षा के प्रश्न को सात-न्यायाधीशों की एक बड़ी पीठ के पास भेज दिया। इस पीठ का गठन होना बाकी है।

निर्णय की संवैधानिकता की समीक्षा करने वाली एक समान शक्ति पीठ और निर्णय को प्रभावित करने वाली भविष्य की सात-न्यायाधीशों की पीठ के निर्धारण की स्थिति में, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने तर्क दिया कि समीक्षा याचिका को खारिज करना एक 'संवैधानिक त्रुटि' होगी।

This piece is translated by Kundan Kumar Chaudhary from Constitution Connect.

Read in English here.

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